सामने आई वे 2 कोशिकाएं, जिनके जरिए शरीर पर हमला करता है वायरस

कोरोना वायरस (coronavirus) को समझने में वैज्ञानिकों (scientists)  ने उन दो कोशिकाओं (cells) का पता लगा लिया है, जिनसे ये वायरस (virus) शरीर में प्रवेश करते हैं. नाक (nose) में पाई जाने वाली ये कोशिकाएं वायरस के लिए होस्ट सेल (host cell for coronavirus) का काम करती हैं।



साल 2019 में चीन के वुहान शहर से फैले कोविड-19 की चपेट में अब तक दुनिया के लगभग सारे देश आ चुके हैं. लगभग 29 लाख 20 हजार लोग कोरोना पॉजिटिव हैं, जबकि 2 लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. अक्सर बेहद मामूली लक्षणों के साथ इस बीमारी की शुरुआत होती है और धीरे-धीरे ये न केवल फेफड़ों, बल्कि दूसरे अंगों पर भी असर डालने लगता है. नया होने के कारण वैज्ञानिकों को इस वायरस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं, लेकिन हाल ही में एक नई जानकारी सामने आई है. उन 2 कोशिकाओं का पता लग चुका है, जिनसे वायरस शरीर में प्रवेश पाते हैं. ये कोरोना से जंग के खिलाफ एक अहम जानकारी मानी जा रही है।

हमारे शरीर में पाई जाने वाली श्वसन नलिका में बहुत तरह की कोशिकाएं होती हैं, जिनके अलग-अलग काम होते हैं. इन्हीं में से एक होती हैं- गॉब्लेट (goblet) कोशिकाएं और सिलिएटेड (ciliated) कोशिका. गॉब्लेट कोशिका का काम है म्यूकस पैदा करना ताकि उसमें नुकसान पहुंचाने वाले वायरस या बैक्टीरिया या किसी भी तरह का पैथोजन फंस जाएं. ये एक तरह के जाल की तरह काम करती हैं. दूसरी कोशिकाएं यानी सिलिएटेड सेल्स का काम इसके बाद शुरू होता है. इनमें बाल की तरह पतली-पतली संरचना होती है, जिसका काम है फंसे हुए पैथोजन को पकड़कर शरीर से बाहर निकालना।



विज्ञान पत्रिका Nature Medicine में इस बारे में एक स्टडी आई. इसके मुताबिक इन कोशिकाओं में बड़ी मात्रा में ACE2 प्रोटीन भी होता है, जो वायरस के स्पाइक प्रोटीन के साथ जुड़ने का काम भी करता है. ये एक तरह से ग्राही का काम करता है. साथ ही इनमें एक और प्रोटीन TMPRSS2 भी होता है, जो वायरस को कोशिकाओं के भीतर तक पहुंचने में मदद करता है. यहीं से इंफेक्शन की शुरुआत होती है. एक बार कोशिकाओं के भीतर पहुंच चुका वायरस खुद को आसानी से बढ़ाने लगता है और धीरे-धीरे शरीर में वायरस लोड हो जाता है, जिससे व्यक्ति बीमार हो जाता है. नाक में पाई जाने वाली यही कोशिकाएं जो असल में बचाती हैं, वही बीमार करने की भी वजह बन जाती हैं. यही वजह है कि वैज्ञानिक स्वस्थ लोगों के भी मास्क पहनने पर जोर दे रहे हैं. जबकि WHO की गाइडलाइन के अनुसार बीमार लोग ही मास्क पहनें तो काम चल सकता है. हालांकि इस बारे में वैज्ञानिकों की ये राय है कि अगर किसी भी वजह से संक्रमित के मास्क से लीकेज हो, तो स्वस्थ व्यक्ति का अपना मास्क उसे दोहरा प्रोटेक्शन दे सकता है।


सामान्य हालातों में, ACE2 को उच्च रक्तचाप और हृदय रोग, डायबिटीज, फेफड़ों की चोट और फाइब्रोटिक विकारों में बीमारी ठीक करने के लिए अहम माना जाता है. साथ ही दूसरा प्रोटीन TMPRSS2 भी कई तरह की जैविक प्रक्रियाओं में शामिल माना जाता है, और इसकी खराबी या कमी से कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं।



कोरोना की जानकारी जुटाने में हो रहे शोध के दौरान और भी कई तरह की जानकारियां सामने आईं. जैसे शोधकर्ताओं ने Human Cell Atlas (HCA) की स्टडी की, जो शरीर की लगभग सारी कोशिकाओं के बारे में बताती है जैसे फेफड़ों, नाक, आंखों, ह्रदय और लिवर में पाई जाने वाली कोशिकाएं. इस दौरान उन कोशिकाओं को देखने की कोशिश हुई, जिनमें पाया जाने वाला प्रोटीन कोरोना वायरस के शरीर में घुसने के लिए रास्ता बनाता है. ये कोशिकाएं नाक, आंखों और आंत में पाई जाती हैं।

इसके बाद से माना जा रहा है कि कोरोना संक्रमण के मामले में आंखों का भी बड़ा रोल है, यानी इससे भी वायरस का प्रवेश शरीर में आसानी से हो पाता है।

हिंदुस्तान टाइम्स में आई एक रिपोर्ट में एम्स के वायरोलॉजी विभाग की पूर्व अध्यक्ष डॉ शोभा ब्रूर बताती हैं कि इस स्टडी से पता चला कि नाक में पाया जाने वाला प्रोटीन वायरस के स्पाइक प्रोटीन से जुड़ने में मदद करता है और इसलिए ही इन्हीं कोशिकाओं के संक्रमित होने का डर सबसे पहले रहता है. इससे यह भी स्पष्ट हो रहा है कि वायरस पहले ऊपरी वायुमार्ग पर असर डालता है. यही वजह है कि ये बीमारी सार्स की तुलना में इतनी संक्रामक साबित हुई है।


इधर ScienceDaily के हवाले से नीदरलैंड के वैज्ञानिक, जो इस स्टडी का हिस्सा भी रहे हैं, Dr Martijn Nawijn कहते हैं कि वैसे तो कई बातें कोरोना वायरस की संक्रामकता को बढ़ाती हैं लेकिन हमारे निष्कर्ष भी इसमें एक अहम बात बताते हैं. नाक में पाई जाने वाली इन कोशिकाओं तक वायरस आसानी से पहुंच पाते हैं. यही वजह है कि बीमारी एक के बाद एक तेजी से सबको अपनी चपेट में ले रही है।
वायरस की खास संचरना भी उन्हें शरीर के इन दो सेल्स से जुड़ने में मदद करती हैं. बता दें कि कोरोना वायरस में कांटेदार या नुकीले स्ट्रक्चर वाला प्रोटीन होता है, जिसे स्पाइक प्रोटीन कहते हैं. हमारे भीतर की कोशिकाएं इस प्रोटीन के लिए होस्ट सेल का काम करती हैं और दोनों एक दूसरे से ताले-चाभी की तरह जुड़ पाते हैं।



वैज्ञानिकों ने माना है कि इसके भीतर पाए जाने वाले प्रोटीन की खास संरचना ही इसे इंसानी शरीर की कोशिकाओं से जुड़ने में मदद करती है. और यही वजह है कि दूसरे वायरस या बैक्टीरिया की अपेक्षा ये वायरस तेजी से फैल रहा है. दरअसल कोरोना वायरस हमारी कोशिका से जुड़ने के लिए कांटेदार या नुकीले स्ट्रक्चर वाले प्रोटीन की मदद लेता है. हमारे भीतर की कोशिकाएं इस प्रोटीन के लिए होस्ट सेल का काम करती हैं और दोनों एक दूसरे से ताले-चाभी की तरह जुड़ पाते हैं।

ऑस्टिन में University of Texas के प्रोफेसर Jason McLellan और उनकी टीम ने इसपर शोध किया. इसमें पाया गया कि ridge जैसी संरचना के कारण ये प्रोटीन आसानी से किसी होस्ट कोशिका से जुड़ पाते हैं. अपने आकार की वजह से इसे स्पाइक प्रोटीन नाम दिया गया. सबसे पहले स्पाइक प्रोटीन ह्यूमन सेल रेसेप्टर से जुड़ते हैं. इसके बाद ही वायरस की झिल्ली या बाहरी परत ह्यूमन सेल मेंब्रेन से जुड़ पाती है. बाहरी परत के जुड़ने के बाद इस वायरस का जीनोम इंसानी कोशिका में प्रवेश करता है और संक्रमण की शुरुआत हो जाती है. यानी अगर प्रोटीन से कोशिका से जुड़ने को रोका जा सके तो संक्रमण ही नहीं हो सकेगा. इस प्रोटीन को टारगेट करने के लिए वैज्ञानिक लगातार रिसर्च कर रहे हैं, जिस दौरान इंसानी शरीर की कोशिकाओं के प्रोटीन की बात भी सामने आई।


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