मप्र / एक सरकार-एक कैबिनेट, तीन अफसर-तीन आदेश... जानिए आखिर क्या है अंदर की कहानी

  • 140 करोड़ के सरकारी प्लांट और 950 करोड़ रु. सालाना का कारोबार निजी कंपनियों के हाथों में देने की तैयारी         एमी एग्रो किसी भी रूप में निजी संस्था, ठेकेदार या आउटसोर्स एजेंसी को टेकहोम राशन के उत्पादन/संचालन कार्य में सम्मिलित नहीं करेगा

    कमलनाथ कैबिनेट के लिए इमेज नतीजेभोपाल . 27 नवंबर 2019। मध्यप्रदेश कैबिनेट की बैठक। पोषण आहार पर 23 नंबर का एजेंडा। एक ही मिनट में सभी ने कहा- ओके, और आनन-फानन में प्रस्ताव पास हुआ। बैठक से बाहर निकलते ही  पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की तत्कालीन अपर मुख्य सचिव गौरी सिंह ने निर्णय के प्रारूप का आदेश जारी कर दिया। 14 बिंदुओं के इस आदेश की खास बात यह थी कि 13 साल से टेकहोम राशन सप्लाई में एमपी एग्रो के साथ लगी तीन निजी कंपनियों के सालाना 950 करोड़ रु. के एकाधिकार को ध्वस्त कर दिया गया था।


    14 बिंदुओं के आदेश में कंडिका 11 में साफ लिख दिया गया कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एमपी एग्रो किसी भी रूप में निजी संस्था, ठेकेदार या आउटसोर्स एजेंसी को टेकहोम राशन के उत्पादन/संचालन कार्य में सम्मिलित नहीं करेगा। जैसे ही यह आदेश प्रमुख सचिव खाद्य विभाग और सीईओ ग्रामीण आजीविका मिशन के पास पहुंचा, पूरे मंत्रालय में हलचल मच गई। माना जा रहा था कि सरकार की मंशा ऐसा करने की बिल्कुल नहीं थी। इसी के कुछ दिन बाद यह साफ भी हो गया, जब मुख्य सचिव ने कैबिनेट मीटिंग के मिनिट्स जारी किए। उन्होंने कंडिका 11 को विलोपित करने की बात कह दी। सारे विभाग हैरत में थे कि वो किसकी बात मानें। कैबिनेट की बैठक के ठीक 50 दिन बाद 16 जनवरी 2020 को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के उप सचिव एसआर चौधरी ने एक नया आदेश निकाला। 


     इस आदेश में कंडिका 11 को हटा दिया गया और एक बार फिर टेकहोम राशन के कारोबार में निजी कंपनियों का रास्ता खुल गया। उप सचिव के इस आदेश पर मंत्री कमलेश्वर पटेल और विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव की सहमति थी।                                                                                                                                          गौरी सिंह की विदाई...  पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की तत्कालीन अपर मुख्य सचिव गौरी सिंह ने कैबिनेट की इस बैठक के बाद 20 दिसंबर को अचानक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने की घोषणा कर दी। उनके बाद मनोज श्रीवास्तव ने इस विभाग का जिम्मा संभाला। गौरी की विदाई को लेकर विधानसभा में भी कई सवाल उठे थे और कुछ विधायकों ने कहा था कि पोषण आहार पर वे सरकार की नीति से सहमत नहीं हैं। यह भी पहली बार हुआ है कि पीएस द्वारा तैयार कैबिनेट निर्णय का प्रारूप बाद में बदल दिया गया।


    निजी एजेंसियों वाला बिंदु हटाया
    एसा नहीं है कि कंपनियों की भागीदारी बढ़ाना है। क्या गांव की महिलाएं प्लांट चला पाएंगी। बाद में किसी भी तरह की कोई परेशान न हो, इसीलिए तो एमपी एग्रो को प्लांट सौंपे गए हैं और निजी एजेंसियों वाला बिंदू हटाया गया।’ - एसआर मोहंती, मुख्य सचिव, मप्र




  • तीन अहम दस्तावेज, जो बयां कर रहे पूरी हकीकत


    कैबिनेट की बैठक : 27 नवंबर 2019 - कैबिनेट ने एक मिनट में पास किया था प्रस्ताव, अपर मुख्य सचिव गौरी सिंह ने उसी दिन निजी कंपनियों की एंट्री को रोक दिया था और यह आदेश जारी किया था ।


    यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एमपी एग्रो किसी भी रूप में निजी संस्था, ठेकेदार या आउटसोर्स एजेंसी को टेकहोम राशन उत्पादन/ संचालन के कार्य में सम्मिलित नहीं करेगा।



  • इस आदेश के एक ही सप्ताह बाद गौरी सिंह ने आश्चर्यजनक रूप से स्वैच्छिक  सेवानिवृत्ति ले ली थी। इस पर विधानसभा में कई सवाल-जवाब भी हुए।



  • मुख्य सचिव की नोटशीट : 5 दिसंबर 2019

    सीएस ऑफिस से 5 दिसंबर को मुख्य सचिव एसआर मोहंती के हस्ताक्षर से एक नोटशीट कैबिनेट के निर्णय की संबंधित विभाग को भेजी गई। इसमें 1 से  10 व 12 से 14 तक के बिंदुओं को स्वीकृत होना बताया, जबकि बिंदु 11 को शामिल नहीं किया गया। इसी बिंदु के आधार पर टेकहोम राशन सप्लाई मेंं निजी कंपनियों की भागीदारी पर रोक लगाई गई थी। नोटशीट पर तारीख 27 नवंबर लिखी है, पर यह विभाग को कई दिन बाद मिली। उससे पूर्व ही गौरी सिंह का पत्र सभी संबंधितों को मिल चुका था।


    50 दिन बाद : 16 जनवरी 2020 - कैबिनेट में हुए फैसलों के आदेश आमतौर पर विभाग एक हफ्ते के भीतर ही जारी कर देते हैं, लेकिन पोषण आहार सप्लाई से जुड़ा यह आदेश 50 दिन बाद निकला।14 बिंदुओं के कैबिनेट फैसले में से 11व नंबर की वही कंडिका हटाकर नया आदेश जारी किया गया, जिसमें निजी संस्था, ठेकेदार या आउटसोर्स एजेंसी को पोषण आहार के काम से बाहर किया गया था।


    ये दोनों आदेश 27 नवंबर 2019 की कैबिनेट के आधार पर जारी हुए थे। अब सवाल उठता है कि सही कौन सा है।


    दिसंबर 2019 से कंपनियों की सप्लाई बंद है, लेकिन नए आदेश से कभी भी हो सकती है वापसी...
    मार्च 2018 में सरकार ने निजी कंपनियों से यह काम वापस लेने की घोषणा कर दी थी, लेकिन तमाम दांव-पेंचों के चलते यह व्यवस्था दिसंबर 2019 तक चलती रही और अब फरवरी के बाद इसे आगे नियमित करने का नया रास्ता खोल दिया गया। प्रदेश में हर माह 12 हजार टन पोषण आहार का उत्पादन किया जाता है और राज्य सरकार इस पर सालाना करीब 950 करोड़ रुपए खर्च करती है। इस कारोबार का फायदा सिर्फ निजी कंपनियां ही उठाती हैं।


    वर्तमान स्थिति: 140 करोड़ में 7 नए संयंत्र तैयार, 5 में उत्पादन भी शुरू


    प्रदेश में 7 स्थानों पर 20 करोड़ (प्रत्येक) की लागत से सरकार ने पोषण आहार संयंत्र बनाए हैं। इनमें से देवास, धार, होशंगाबाद, मंडला, सागर में उत्पादन शुरू हो चुका है। शिवपुरी और रीवा का काम भी अंतिम चरण में है। मतलब इन पर 140 करोड़ रुपए लग चुके हैं।


    2 हर प्लांट प्रतिमाह 12 हजार टन पोषण आहार का उत्पादन करेगा। इससे 80 लाख बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बालिकाओं को आहार उपलब्ध कराया जाना है।


    3   तेरह साल से यह काम सरकारी कंपनी एमपी एग्रो के पास है। उसने निजी कंपनियों एमपी एग्रो न्यूट्री फूड, एमपी एग्रो टॉनिक्स और एमपी एग्रो फूड इंडस्ट्रीज को यह काम भागादारी के तहत दे रखा है।





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