हमारे पूर्वज भी महामारियों से बचने के लिए करते थे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन,


प्राचीनकाल के लोगों ने भी सोशल डिस्टेंसिंग अपनाकर ही बचाई मानव सभ्यता


आधुनिक विज्ञान के प्रसार के पहले जब कोरोना जैसी कोई महामारी फैलती थी, तो गांव के गांव और शहर के शहर उसकी चपेट में आ जाते थे। लाखों लोगों की मौत हो जाती थी और बचने का कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता था।


ऐसे समय में प्रकृति ही लोगों का उपचार करती थी। लंबे समय में समाज के शेष लोगों में इस बीमारी से लड़ने की क्षमता विकसित हो जाती थी, जिसे हर्ड इम्यूनिटी कहा जाता है। वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के मतानुसार इस हर्ड इम्यूनिटी ने मानव सभ्यता को धरती पर बचाए रखने में सबसे बड़ा योगदान दिया है।


आज कोरोना के मामले में भी वैज्ञानिकों को लोगों में हर्ड इम्यूनिटी के विकसित होने का इंतजार है।
उस समय जब किसी व्यक्ति को कोई संक्रामक बीमारी हो जाती थी तो गांव के लोग उस व्यक्ति को गांव से बाहर निकाल देते थे, जो किसी सुरक्षित स्थान पर रहता था। वहीं पर उसके रहने और भोजन का प्रबंध कर दिया जाता था।


इस तरह बाकी लोगों में संक्रमण नहीं फैलता था। लेकिन अगर यह आशंका होती थी कि बीमारी हवा या मिट्टी जैसी चीजों तक में फैल चुका है, पूरा गांव या पूरा इलाका पीड़ित लोगों को छोड़कर उस क्षेत्र को छोड़ कहीं और बसने चला जाता था।


इस प्रकार बाकी के लोग उस संक्रामक बीमारी से बच जाते थे। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि हैजा और प्लेग जैसी महामारी के दौरान सैकड़ों गांवों ने सामूहिक पलायन कर अपना अस्तित्व बचाया।


क्या है हर्ड इम्यूनिटी


हर्ड इम्यूनिटी या हर्ड प्रोटेक्शन का अर्थ है कि जब किसी समाज के 70 से 90 फीसदी लोग किसी संक्रामक बीमारी के प्रति रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेते हैं। इस स्थिति में कोई भी व्यक्ति जब पांच लोगों से मिलता है तो उसमें से चार उस रोग से प्रतिरोधी क्षमता से युक्त होते हैं।


ऐसी स्थिति में इस बात की संभावना ज्यादा होती है कि किसी व्यक्ति को वह संक्रामक रोग न हो। तकनीकी भाषा में इस क्षमता को ही 'हर्ड इम्यूनिटी' कहा जाता है।


यहां मिलते हैं प्रमाण


वर्ष 800 से 1200 के बीच के लोगों के डीएनए विश्लेषण से पता चलता है कि इस दौरान प्लेग ने बड़ा कहर बरपाया था। पश्चिम बंगाल से आज के यूपी, बिहार से होते हुए यह केरल तक फैल गया था।


प्लेग के अलावा हैजा और अन्य बीमारियों के अलावा बाढ़ और सूखे की प्राकृतिक आपदा ने भी इसके असर को बढ़ाने में अपना योगदान दिया था। यह उसी प्रकार है जैसे कोरोना का असर उन्हीं लोगों पर ज्यादा देखने को मिल रहा है जिनको अन्य बीमारियां भी अपना शिकार बना चुकी है।


वैज्ञानिकों के मतानुसार, महाराष्ट्र के इमामगांव स्थान से प्राप्त हड्डियों से पता चलता है कि आज से लगभग 3500 साल पूर्व यहां पर किसी संक्रामक बीमारी ने अपना असर दिखाया था। इसके पहले राजस्थान के बालाथल क्षेत्र में भी 4000 वर्ष पूर्व इसी प्रकार की भयानक संक्रामक बीमारी ने लोगों को अपना शिकार बनाया था।


मध्यकाल में है उल्लेख


एमिटी स्कूल ऑफ लिबरल आर्ट्स की प्रोफेसर डॉक्टर चांदनी सेनगुप्ता कहती हैं कि मध्यकाल में भी संक्रामक बीमारियों ने अपना खूब कहर ढाया था। इब्नबतूता ने भी अपने संस्मरणों में इस क्षेत्र में प्लेग और इसी तरह की अन्य संक्रामक बीमारियों के असर का उल्लेख किया है।


यह लगभग वही समय है जब मुहम्मद बिन तुगलक ने दौलताबाद को अपनी दूसरी राजधानी बनाया था। इब्नबतूता ने लिखा है कि उसके अनेक सैनिक मलेरिया के कारण मारे गए थे।


सिंध प्रांत में भी 1548 में प्लेग की महामारी ने अपना असर दिखाया था। इससे भारी संख्या में लोगों की मौत हुई थी। तुजुक-ए-जहांगीरी में उल्लेख है कि 1616 में पंजाब क्षेत्र में प्लेग ने हजारों लोगों की जानें ले ली थीं।


इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि धीरे-धीरे यह असर कम होता गया था। जहांगीर ने 1617 में कश्मीर में भी प्लेग फैलने का जिक्र किया है।


 


 


 


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